भाषा संबंधी आलेख || Article on Language

  1. भाषाओं पर मंंडराता खतरा
  2. विश्व हिंदी दिवस
  3. भारत में बोलियों की लडाई और हिंदी भाषा का भविष्य 


4. मातृभाषा का महत्व 

देश में भाषाओं को लेकर चल रही उठापटक के शोर के बीच एक घटना याद आ रही है जो संभवत: चंदू के सिर के दीवार से टकराने पर हुई मौत से संबंधित है। तेलांगाना राज्य के नालगोंड जिले के तिरूमालागिरी गांव के निजी स्कूल में पहली कक्षा में चंदू पढ़ने आया करता था। 6 वर्ष का नन्हा बच्चा चंदू किसी जनजाति समुदाय से ताल्कुक रखता था और शायद अपने पूरे खानदान में स्कूल जाने वाला पहला बच्चा था। चंदू अपनी कक्षा में अंग्रेजी न बोल पाने के कारण मारा गया। चंदू को अपनी अध्यापिका द्वारा पूछे गए एक सवाल का जवाब अंग्रेजी में देना था। अंग्रेजी न जानने के कारण चंदू तेलुगू बोलने लगा। इस पर बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ाने लगे और यह चिढ़कर तेलुगू में जोर-जोर से चीखने लगा। इस सबसे झल्लाई अध्यापिका ने उसे मारने के लिए हाथ उठाया और चंदू बचने के क्रम में दीवार से जा टकराया और फिर वह मर गया। आखिर 6 वर्ष के बच्चे का कोमल सर कितना आघात सह सकता है।


उक्त घटना के 2 वर्ष बीत गए हैं। उस समय स्कूल की अध्यापिका और प्रबंधन की गिरफ्तारी ही समाचार की सुर्खियाँ बनी थी। मीडिया ने भी इस घटना को कोई विशेष महत्व नहीं दिया था। यहां पर बात केवल चंदू की मौत की नहीं है बल्कि देश में प्रतिवर्ष लाखों चंदू अंग्रेजी न जानने के कारण अपने अधिकारों से वंचित होते हैं और देश के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान देने का अवसर नहीं प्राप्त कर पाते है। चंदू की मौत का आरोप उन सभी के सर पर होना चाहिए जिन्होंने प्राथमिक कक्षाओं में देशी भाषाओं को छोड़कर अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई का प्रचलन शुरू किया। आखिर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में स्थानीय भाषाओं का बोलना क्यों स्वीकार नहीं किया जाता है। भाषा माध्यम के संबंध में ईमानदारी से किए गए सभी शोध यही बताते हैं कि प्रारंभिक शिक्षा के दौरान परिवेश की भाषा में शिक्षा से बच्चे को सीखने में आसानी होती है। इससे उसमें भाषाई लचीलापन भी आता है जिसके बाद अन्य भाषाएं सीखना आसान हो जाता है। 1964 में गठित कोठारी आयोग ने भी अपने प्रमुख सुझाव में कहा था कि सभी बच्चों को प्राइमरी कक्षाओं में मातृभाषा में ही शिक्षा दी जाए और माध्यमिक स्तर पर स्थानीय भाषाओं में शिक्षण को प्रोत्साहन दिया जाए।


मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2016 का प्रारूप जारी किया जा चुका है, परन्तु दुख की बात है कि इस प्रारूप में हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं को प्राथमिक कक्षाओं में शिक्षा का माध्यम बनाना राज्यों की इच्छा पर छोड़ दिया गया है, वहीं अंग्रेजी के लिए कहा गया हे कि बच्चों को राष्ट्रीय गतिशीलता मंे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए अंग्रेजी पढ़ने और लिखने में कुशल बनाना आवश्यक है देश मंेे अंग्रेेजी पढ़ाने का विरोध कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति नहीं करेगा, लेकिन इसे एक विषय के रूप में होना चाहिए, न कि शिक्षा के माध्यम के रूप में। इस नीति में संस्कृत भाषा के शिक्षण के लिए अधिक उदार पैमाने पर सुविधा उपलब्ध कराने की बात कही गई है, परन्तु अन्य भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम अनिवार्य तौर पर बनाए जाने की बात नहीं गई है। हालांकि इस प्रारूप में एक स्थान पर लिखा गया है कि छात्रों को जब उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाता है, तो वे अच्छे ढंग से सीखते हैं, परंतु मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम  कैसे बनाया जाएगा, इस पर बात नहीं की गई है। दर असल अब समय आ गया है कि हम भाषा और शिक्षा के रिश्ते पर खुलकर बात करंे। जब सभी शोध मातृभाषा में ही प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने की वकालत कर रहे हैं तब हम किसके दबाव में आकर पहली कक्षा से ही बच्चों के मन में अंग्रेजी ठूसने के प्रयास में जी जान से जुट जाते है। हमारे अपने बच्चों के प्रति हमें ही संवेदनशीलता का परिचय देना होगा।


आज देश में 38 बोलियां संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिए जाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहीं हैं, इसमें से तीन (भोजपूरी, राजस्थानी व भाटी) के लिए संसद के आगामी सत्र में विधेयक लाया जाएगा। इसके लिए देश के अनेक भागों में संघर्ष हो रहे हैं, परंतु देश में मातृभाषाओं स्थानीय भाषाओं में शिक्षा दिए जाने के लिए या कहीं सघर्ष नहीं हो रहा है। अब वक्त आ गया है कि देश में किसी और चंदू की मौत न हो, इसकी पर्याप्त व्यवस्था की जाए। कानून की नजर में तो चंदू की मौत के गुनाहगार केवल स्कूल प्रबंधक और अध्यापिका ही हैं, परंतु दोष उस संपूर्ण समाज और पूरी व्यवस्था का है जो आजादी के 70 वें वर्ष में भी अभी गुलामी की मानसिकता से स्वतंत्र नहीं हो पाया है और जिसे यह लगता है कि विश्व में अंग्रेजी ही एक मात्र ज्ञान की खिड़की है, जबकि हमारे सामने दुनिया के तमाम विकसित देशों के उदाहरण मौजूद हैं जिन्होंने बिना अंग्रेजी के अपनी भाषाओं के बलबूते विश्व के शीर्ष स्तर पर अपनी पहचान कायम की है। हम भी अपनी भाषाओं के माध्यम से यह मुकाम हासिल कर इस स्थापित भ्रम को तोड़ सकते हैं।


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