मंगलवार, 24 अगस्त 2021

नयी शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं का स्थान

                                           नयी शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं का स्थान

- दिलीप कुमार सिंह 

उप प्रबंधक (राजभाषा)

भारत कोकिंग कोल लिमिटेड धनबाद

एवं सचिव, नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति धनबाद 

सार: किसी भी भाषा के लुप्त होने या उसके संकटग्रस्त श्रेणी में आ जाने के परिणाम बहुत दूरगामी होते हैं। भाषा का एक-एक शब्द महत्त्वपूर्ण होता है। प्रत्येक शब्द अपने पीछे संस्कृति की एक लंबी परंपरा को लेकर चलता है। इसलिए भाषा लुप्त होते ही संस्कृति पर खतरा मंडराने लगता है। संस्कृति और उस भाषा के संचित ज्ञान को बचाने के लिए भाषा के संरक्षण की बहुत आवश्यकता है। भारत की नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में इस बात पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया है कि दुर्भाग्य से भारतीय भाषाओं को समुचित ध्यान और देखभाल नही मिल पायी है, जिसके तहत देश ने विगत 50 वर्षों में 220 भाषाओं को खो दिया है। युनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्तप्रायघोषित कर दिया है। देश में इन समृद्ध भाषाओं/संस्कृति की अभिव्यक्ति को संरक्षित या उन्हें रिकार्ड करने के लिए कोई ठोस नीति अभी तक नहीं थी। नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सभी भारतीय भाषाओं विशेषकर मातृभाषाओं या स्थानीय भाषाओं को प्राथमिक स्तर पर अनिवार्य शिक्षा का माध्यम और उसके आगे यथासंभव भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाए जाने की बात कही गयी है। भारतीय भाषाओं के संरक्षण के लिए यह एक बहुत बड़ा कदम है।

  इस कार्य के लिए अनेक अकादमी व संस्थान भी खोले जाने की घोषणा की गयी है।  इन नीति में भारत की सभी भाषाओं के साथ संतुलन बनाने की कोशिश की गयी है । इस नीति में यह भी कहा गया है कि दुनिया भर के विकसित देशों में अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं में शिक्षित होना कोई बाधा नहीं है और इसका भरपूर लाभ उन्हें मिलता है, जबकि भारत में अभी भी यह बहुत मुश्किल कार्य है।

की-वर्ड:- शिक्षा नीति, भारतीय भाषा, शास्त्रीय भाषा, संस्कृत, मातृभाषा, स्थानीय भाषा, लुप्त प्राय भाषा। 

मानव के सम्यक विकास, मन की कल्पना को मूर्त रूप प्रदान करने, स्वस्थ समाज और समृद्धिशाली व शक्तिसंपन्न राष्ट्र के निर्माण में शिक्षा का महत्त्व निर्विवाद रूप से सर्वाधिक है। भारत में बहुत पुराने समय से ही शिक्षा की बहुत समृद्ध परंपरा रही है। भारत दुनिया को हजारों वर्षों से ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करता रहा है। भारत की महान ज्ञान परंपरा और शिक्षा व्यवस्था ने आर्यभट, वाराहमिहिर, चरक, सुश्रुत, पाणिनि, नागार्जुन, गौतम, मैत्रेयी, गार्गी जैसे अनेक महान विद्वानों को जन्म दिया है। इन विद्वानों ने अपनी भाषा में खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा विज्ञान, व्याकरण, दर्शन, योग, अभियांत्रिकी, वास्तुकला, भवन निर्माण आदि में विश्व को मौलिक योगदान दिया है।

समय के साथ इस शिक्षा व्यवस्था में बहुत क्षरण होता गया। जिस देश में कभी तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला विश्वविद्यालय जैसे विश्वस्तरीय शिक्षा संस्थान हुआ करते थे, आज उसके विश्वविद्यालय दुनिया भर में शीर्ष 300 में  स्थान बनाने के लिए संघर्षरत हैं। इसके अनेक ऐतिहासिक व राजनीतिक कारण रहे हैं। गुलाम भारत में यहाँ की गौरवशाली शिक्षा प्रणाली को नष्ट किया गया। प्राचीन शिक्षा प्रणाली नष्ट होने से ज्ञान के सभी क्षेत्रों में क्षरण होना शुरू हो गया।

स्वतंत्र भारत में राष्ट्र निर्माण के लिए स्पष्ट और सुविचारित शिक्षा नीति की आवश्यकता महसूस की गयी।  इसके लिए पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति वर्ष 1968 में तैयार की गयी। इस नीति में तमाम प्रावधानों के साथ ही 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा, क्षेत्रीय भाषाओं के अध्ययन पर बल, त्रिभाषा सूत्र का निर्माण, संस्कृत के अध्ययन की जरुरत प्रमुख बिंदुओं में से थे।

वर्ष 1986 में दूसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की गयी। इसके अंतर्गत अल्पसंख्यकों, दिव्यांगों, महिलाओं, अनुसूचित जातियों/जनजातियों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहन, छात्रवृत्तियों में वृद्धि, ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड आदि प्रमुख बिंदुओं में से थे। इस नीति में जीडीपी का कुल 6% शिक्षा पर खर्च करने की सिफारिश की गयी थी। इसमें 1992 में कुछ संशोधन भी किए गए थे। इस शिक्षा नीति में भी शिक्षा के माध्यम के रूप में क्षेत्रीय भाषाओं की वकालत की गयी थी। अंग्रेजी व अन्य विदेशी भाषाओं के अध्ययन की सुविधा उपलब्ध कराने पर बल दिया गया था। साथ ही हिंदी को संपर्क भाषा के तौर पर विकसित करने की आवश्यकता जताई गई थी।

वर्ष 2020 में लागू की गयी नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी अन्य महत्त्वपूर्ण नीतियों के साथ ही भाषाओं विशेषकर मातृभाषा और स्थानीय भाषा में शिक्षा पर बहुत बल दिया गया है। अब तक लागू की गयी तीनों ही राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों में शिक्षा माध्यम के रूप में मातृभाषा या स्थानीय भाषा को सुझाया गया है। इसके साथ ही अंग्रेजी व संस्कृत के अध्ययन पर बल दिया गया है। इससे पता चलता है कि शिक्षा नीति के द्वारा देश की भाषा नीति को भी निर्धारित करने के प्रयास किए गए हैं। 

तृतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के बारे में बाकी दोनों शिक्षा नीतियों की तुलना में बहुत अधिक विस्तार से चर्चा की गयी है। इसके अध्याय-4 और अध्याय-22 दोनों में ही शिक्षा के माध्यम के रूप में भाषा, भाषा का संरक्षण व संवर्द्धन और अनुवाद के लिए नीति निर्धारित की गयी है। अध्याय-4 में मातृभाषा और/या स्थानीय भाषा को प्राथमिक शिक्षा का माध्यम और आगे के लिए यथासंभव भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाया जाना निर्धारित किया गया है। अध्याय-22 में समस्त भारतीय भाषाओं, कला और संस्कृति का संवर्धन करने की बात कहते हुए शिक्षा प्रणाली में बहुभाषिकता को समय की आवश्यकता बतायी गयी है।

अध्याय 4 में मातृभाषा या स्थानीय भाषाओं में शिक्षण के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि छोटे बच्चे अपने घर की भाषा/मातृभाषा में सार्थक अवधारणाओं को अधिक तेजी से सीखते हैं। ग्रेड-5 तक अनिवार्य रूप से शिक्षा का माध्यम घर की भाषा/मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा होनी चाहिए। आगे यह भी कहा गया है कि यह बेहतर होगा कि ग्रेड-8 और उससे आगे तक भी शिक्षा का माध्यम घर की भाषा/मातृभाषा/स्थानीय भाषा/क्षेत्रीय भाषा हो। सार्वजनिक और निजी दोनों तरह के स्कूल इसकी अनुपालना करेंगे। यदि निजी स्कूल इस नीति को मानेंगे तभी इसके अपेक्षित परिणाम सामने आयेंगे। इसमें इस बात को स्पष्ट तौर पर रेखांकित किया गया है कि किसी भाषा को सीखने के लिए इसे शिक्षा का माध्यम होने की आवश्यकता नहीं है। भारत में केवल अच्छी अंग्रेजी सिखाने के उद्देश्य से पूरी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजी माध्यम से अपनाये जाने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। भले ही छात्र अवधारणाओं को समझने के बजाए रटने पर मजबूर हों। यूनेस्को द्वारा जारी ग्लोबल रिपोर्ट 2005 के एक तथ्य के अनुसार एक बार विषय की मूल अवधारणा अपनी भाषा में समझ में आ जाए तो उच्चतर शिक्षा में किसी भी भाषा में अध्ययन सहज हो सकता है।  

दुनिया भर के भाषाविद और शिक्षाविद इस बात पर निर्विवाद रूप से एकमत हैं कि मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने से बालक की मौलिक रचनात्मक प्रतिभा को विकसित करने में निश्चय ही मदद मिलती है। मातृभाषा में शिक्षा से बच्चों की कल्पनाशीलता और सृजनशीलता को बचाया जा सकता है। भाषाविदों का मानना है कि जो बच्चे अपनी मातृभाषा में जितनी ज्यादा पकड़ रखते हैं, वे उतने ही रचनात्मक और तार्किक होते हैं। इससे मस्तिष्क पर अनावश्यक बोझ नहीं पड़ता है। हमारे देश में शिक्षा पर समय-समय पर गठित सभी समितियों, सभी शैक्षिक आयोगों, राष्ट्रीय शिक्षा नीति आदि में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को ही बनाए जाने की बात कही गयी है। 


वर्तमान में भारत में मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों की स्थिति और उनकी संख्या लगातार दयनीय होती जा रही है। वहीं अंग्रेजी माध्यम के स्कूल स्थानीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों को निगलते जा रहे हैं। भारतीय भाषाओं के  बहुत से स्कूल अंग्रेजी माध्यम में बदलते जा रहे हैं। इस दिशा में सरकारी स्तर पर कार्य हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश  और महाराष्ट्र के तमाम सरकारी स्कूलों को चरणबद्ध तरीके से अंग्रेजी माध्यम में बदला जा रहा है। इससे संबंधित तमाम खबरें पिछले वर्षों में समाचार-पत्रों की सुर्खियाँ बनीं। बिज़नेस स्टैंडर्ड के दिनांक 20 नवंबर, 2019 की खबर के मुताबिक  आंध्र प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों को अकादमिक सत्र 2020-21 से कक्षा 1 से 6 तक के लिए अंग्रेजी माध्यम स्कूल में बदल दिया जाएगा। इस प्रकार की व्यवस्था देश के लिए घातक होगी। 

महात्मा गांधी ने 20 अक्टूबर, 1917 को  गुजरात के भड़ौच में एक शिक्षा सम्मेलन में कहा था - "विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा पाने में दिमाग पर जो बोझ पड़ता है, वह असह्य है। यह बोझ हमारे बच्चे उठा तो सकते हैं, लेकिन उसकी कीमत हमें चुकानी पड़ती है, वे दूसरा बोझ उठाने लायक नहीं रह जाते हैं। इससे हमारे स्नातक अधिकतर निकम्मे, कमजोर, निरुत्साही, रोगी और कोरे नकलची बन जाते हैं। इससे हम नयी योजनाएं नहीं बना सकते हैं और यदि बनाते हैं, तो उन्हें पूरा नहीं कर पाते हैं।" 

आज विडंबना है कि डॉलर में वेतन दिलवाने वाले रोजगार के अवसर अंग्रेजी में ही उपलब्ध हैं। इसके चलते बाजार की मांग अंग्रेजी के पक्ष में ही अधिक है। हालांकि यह स्थिति विश्व में अमेरिका के ताकतवर रहने और विश्व व्यापार की मुद्रा डॉलर के रहने तक ही रहेगी। देश में शैक्षिक परिदृश्य कुछ इस प्रकार का बन गया है कि चारों ओर अंग्रेजी माध्यम के ही स्कूल दिखते हैं। इसी अंग्रेजी की अनिवार्यता से देश की मौलिकता को बहुत बड़ा आघात पहुंचा है। यहाँ पर अंग्रेजी से बैर नहीं है लेकिन उसकी अनिवार्यता देश के लिए घातक बन गयी है। हालांकि एक विदेशी भाषा के रूप में अंग्रेजी सीखना बहुत आवश्यक है। यूनेस्को की ग्लोबल रिपोर्ट 2005 में भी सिफारिश की गयी है कि जातीय रूप से विविधतापूर्ण समुदाय में न्यूनतम 6 वर्षों तक मातृभाषा में शिक्षा देना अनिवार्य है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शिक्षा के माध्यम से इतर दूसरी भाषा बोलने वाले मुख्य धारा से पीछे न छूट जाएं। 

पूर्व राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों की भांति नयी नीति में भी बहुभाषावाद और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की जरूरत को ध्यान में रखते हुए त्रिभाषा सूत्र को लागू किए जाने की बात कही गयी है। इसके लिए किसी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाने का प्रावधान किया गया है। यह कदम सभी भारतीय भाषाओं में संतुलन बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है। सभी राज्य अपनी जरूरत के अनुसार तीनों भाषाओं का निर्धारण कर सकेंगे।  

अध्याय-4 में ही संस्कृत की महत्ता के बारे में लिखा गया है कि संस्कृत का शास्त्रीय साहित्य इतना विशाल है कि सारे ग्रीक और लैटिन साहित्य को भी यदि मिलाकर इसकी तुलना की जाए तो भी इसकी बराबरी नहीं कर सकता है। इस नीति के अनुसार संस्कृत को त्रिभाषा के मुख्य धारा विकल्प के साथ और स्कूल व उच्चतर शिक्षा के सभी स्तरों पर छात्रों के लिए एक महत्त्वपूर्ण, समृद्ध विकल्प के रूप में पेश किया जाएगा। वास्तव में संस्कृत की महत्ता से सभी भलीभांति वाकिफ हैं, किंतु देश में संस्कृत का अध्ययन कम होता जा रहा है। यदि इसको जानने वाले लोग ही नहीं रहेंगे तो संस्कृत में उपलब्ध अपार ज्ञान संपदा का लाभ कौन उठा पाएगा। इस नीति में संस्कृत का महत्त्व बताते हुए इसके सुव्यस्थित अध्ययन की आवश्यकता बतायी गयी है। ग़ौरतलब है कि जिन विद्याशाखाओं में हम विश्वगुरू थे, आज संस्कृत की प्राचीन अध्ययन परंपरा मूल स्वरूप में न रहने के कारण  हम आयातित ज्ञान पर निर्भर हो गए हैं। 

भाषा और संस्कृति का आपस में गहरा रिश्ता है। हमारी संस्कृति हमारी भाषाओं में निहित है। इस नीति के अध्याय-22 में स्पष्ट है कि संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के लिए हमें उस संस्कृति की भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन करना होगा। 

इसके लिए पहली बार शिक्षा नीति में लुप्त हो चुकी और लुप्त प्राय भाषाओं पर चिंता व्यक्त की गयी है। इसमें उल्लेख किया गया है कि देश ने विगत 50 वर्षों में 220 भाषाओं को खो दिया है। युनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्त प्राय घोषित किया है।  विभिन्न भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं। यदि शिक्षा प्रणाली बहुभाषी होगी और भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाया जाएगा, तो काफी हद तक इस समस्या का निपटान किया जा सकता है। भाषा के लुप्त होने से पूरे समाज को क्षति होती है और हजारों वर्षों में सहेजी गयी विरासत और धरोहर नष्ट हो जाती है। उदाहरण के लिए आदिवासी समाज की भाषाएं आज सर्वाधिक हाशिए पर हैं, और इन भाषाओं में व्यक्त प्रकृति विषयक या अन्य प्रकार के ज्ञान का यदि संरक्षण नही किया जाएगा तो भाषा लुप्त होने के साथ ही ज्ञान भी नष्ट हो जाएगा और अंत में आदिवासी संस्कृति का अस्तित्त्व भी खतरे में पड़ जाएगा। 

इसी अध्याय में भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज तमाम भाषाओं के समक्ष आसन्न संकट की भी बात उठायी गयी है और कहा गया है कि ये भाषाएं भी कई प्रकार के संकटों का सामना कर रही हैं। भाषाओं को चुनौतीपूर्ण स्थितियों से बचाने के लिए और उनको प्रासंगिक व जीवंत बनाए रखने के लिए उच्चतर गुणवत्तापूर्ण अधिगम एवं प्रिंट सामग्री का सतत प्रवाह बनाए रखने की अपेक्षा भी इस नीति में की गयी है। समसामयिक मुद्दों और अवधारणाओं को इसमें व्यक्त करने की क्षमता बनाने के लिए इन सभी भाषाओं के शब्दकोश और शब्द भंडार को आधिकारिक रूप से लगातार अद्यतन करने की आवश्यकता जतायी गयी है। ऐसा कार्य दुनिया के तमाम देशों द्वारा अपनी भाषाओं की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए किया जाता है। भारतीय भाषाओं में इस दिशा में बहुत कम काम हुआ है। इसीलिए नई संकल्पनाओं और अवधारणाओं को भारतीय भाषाओं में व्यक्त करने में समस्यायें होती हैं। 


भारत में भाषा शिक्षण को बहुत गंभीरता से कभी नहीं लिया गया है। इस नीति में उच्चतर योग्यता के भाषा शिक्षकों की कमी पर चिंता जाहिर करते हुए उच्चतर योग्यता के भाषा शिक्षकों के एक बड़े कैडर को विकसित करने की जरुरत बतायी गयी है। इससे भविष्य में बहुत बड़े स्तर पर भाषा शिक्षकों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे और बहुभाषी पाठ्यक्रमों के निर्माण में बहुत मदद मिलेगी। शिक्षा का माध्यम और शिक्षा में भारतीय भाषाओं को समुचित स्थान न मिल पाने एक बहुत बड़ा कारण यह भी रहा है। 

दुनिया भर के विकसित देश अपने यहाँ केवल अंग्रेजी में ही उपलब्ध ज्ञान को ही सर्वोपरि नहीं मानते हैं बल्कि इसके लिए वे विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध उच्चस्तरीय ज्ञान को अपने देश की स्थानीय भाषाओं में अनुवाद करवाते हैं और इसे पाठ्यक्रम में सम्मिलित करवाते हैं। भारत में अनुवाद को लेकर किसी प्रकार की स्पष्ट राष्ट्रीय नीति की कमी रही है। भारतीय भाषा संस्थान मैसूर द्वारा राष्ट्रीय अनुवाद मिशन (एनटीएम) की स्थापना कुछ वर्षों पहले की गयी थी। पहली बार  इस नीति में अनुवाद के महत्त्व को रेखांकित किया गया है। अनुवाद एवं निर्वचन को और अधिक विस्तार देने के लिए कहा गया है ताकि देशवासियों को भारतीय व विदेशी भाषाओं की उच्चस्तरीय गुणवत्ता वाली सामग्री को उपलब्ध कराया जा सके। इसके लिए इस नीति में भारत में इंस्टिट्युट ऑफ ट्रांसलेशन एंड इंटरप्रिटेशन (आईआईटीआई) की स्थापना के लिए प्रावधान किया गया है। इस संस्थान में बहु भाषाभाषी और विषय विशेषज्ञ तथा अनुवाद एवं निर्वचन के लिए विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाएगी। यह संस्थान देश के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण साबित होगा तथा राष्ट्रीय महत्त्व के कार्य यहाँ पर संपन्न होंगे। यह संस्थान देश में अनुवाद प्रौद्योगिकी को बढावा देने का कार्य करेगा। अभी तक देश में इस दिशा में कुछ विशेष प्रयास  नहीं हुए हैं। 

भारत की शास्त्रीय भाषाओं का दर्जा प्राप्त सभी भाषाओं और उनके साहित्य का अध्ययन करने के लिए संस्थानों और विश्वविद्यालयों को विस्तार देने के लिए भी इस नीति में चर्चा की गयी है। इसके अंतर्गत उपेक्षित हजारों पांडुलिपियाँ को इकट्ठा करने व अनुवाद करने और अध्ययन करने के मजबूत प्रयास करने के प्रावधान किये गए हैं। इस कार्य के लिए देश भर के संस्कृत एवं सभी भारतीय भाषाओं के संस्थानों एवं विभागों को उल्लेखनीय रूप से सशक्त बनाया जाना है। 

भारतीय भाषाओं में शोध कार्य को बढ़ावा देने के लिए विशेष रूप से भाषाओं के प्रति समर्पित एक नया संस्थान स्थापित करने की योजना भी इस नीति के अंतर्गत बनायी गयी है। एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात इस नीति में है कि पाली, प्राकृत और फारसी भाषा के लिए एक राष्ट्रीय संस्थान स्थापित किया जाएगा। इससे इन भाषाओं के संस्थानों को एक नया आयाम मिलेगा। इन सभी संस्थानों के माध्यम से सभी भारतीय भाषाओं (शास्त्रीय, आदिवासी और लुप्तप्राय) को संरक्षित और प्रोत्साहित किया जाएगा। इस कदम से इन भाषाओं में बड़े पैमाने पर शोधकार्यों की शुरुआत हो सकेगी और इन भाषाओं में उपलब्ध प्राचीन ज्ञान को जनसामान्य के लिए उपलब्ध कराया जा सकेगा। 

भाषा के व्यवस्थित अध्ययन और शोधकार्य के लिए भाषा विशेष के लिए संस्थान होने परम आवश्यक हैं। इस उद्देश्य से विभिन्न विषयों की नवीन अवधारणाओं और संकल्पनाओं को आमजन की भाषा में सुलभ कराने के उद्देश्य से संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित प्रत्येक भाषा के लिए अकादमी स्थापित किए जाने की घोषणा इस नीति में की गयी है। भाषा संवर्धन के लिए यह बहुत उपयोगी कदम साबित होगा। इन अकादमियों के माध्यम से इन सभी भाषाओं में नियमित रूप से नवीनतम शब्दकोश जारी किए जाएंगे। इसके अलावा 8वीं अनुसूची के अतिरिक्त भारत की अन्य बड़ी भाषाओं के लिए भी अकादमी स्थापित करने की घोषणा भी इस अध्याय में की गयी है। इससे भारत की तमाम भाषाओं की उन्नति का मार्ग खुल जाएगा और इन सभी भाषाओं में सुव्यवस्थित तरीके से अध्ययन और शोध कार्य होने लगेंगे और इन भाषाओं के संरक्षण का कार्य हो सकेगा। 

भाषा को संरक्षित और प्रोत्साहित करने का कार्य  भाषायी डिजिटलीकरण के बिना अधूरा है। इसे ध्यान में रखते हुए इस नीति में डिजिटलीकरण के लिए प्रावधान किए गए हैं। इस नीति में स्पष्ट तौर पर उल्लेख है कि भारतीय भाषाओं और उनसे संबंधित स्थानीय कला एवं संस्कृति का वेब आधारित प्लेटफॉर्म, पोर्टल, विकीपीडिया के माध्यम से दस्तावेजीकरण किया जाएगा। यह कार्य व्यापक तौर पर जनभागीदारी के माध्यम से किए जाएंगे। ऐसी सभी परियोजनाओं में सरकार द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। यह कदम लुप्त हो चुकी और लुप्तप्राय दोनों प्रकार की भाषाओं के लिए समान रूप से उपयोगी साबित होगा। 

इस नीति में भाषा, कला और संस्कृति के अध्ययन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सभी आयु के लोगों के लिए छात्रवृत्ति की स्थापना की बात कही गयी है। प्रोत्साहन स्वरूप भारतीय भाषाओं में रचे जानी वाली उत्कृष्ट कविता व गद्य के लिए पुरस्कार स्थापित किए जाएंगे। 

भारतीय भाषाओं की उन्नति और प्रगति तभी संभव है, जब उसे प्रत्यक्ष तौर पर रोजगार से जोड़ा जाएगा। भारतीय भाषाओं को रोजगार की दृष्टि से अभी भी अंग्रेजी वाला स्थान प्राप्त नहीं है। इस बात को राष्ट्रीय शिक्षा नीति में समझा गया है और बहुत ही स्पष्ट रूप से कहा गया है कि "भारतीय भाषाओं में प्रवीणता को रोजगार के मानदंडों की अर्हता में शामिल किया जाएगा"। भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा बढ़ाने में यह बहुत महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा। भारत में अंग्रेजी को रोजगार दिलाने में सहायक भाषा के रूप में जाना जाता है। इसलिए केवल इस भाषा में प्रवीणता प्राप्त करने को ही सफलता की कुंजी मान लिया जाता है। जब यह गौरव अन्य भारतीय भाषाओं को मिलेगा तब स्वत: ही भारतीय भाषाओं के समक्ष उत्पन्न संकट दूर हो जाएगा। 

इस प्रकार नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में भारतीय भाषाओं के लिए भी एक नीति निर्धारित की गयी है। विविध तरीकों से भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहित, संरक्षित और संवर्धित करना इसके प्रमुख उद्देश्यों में से है। सभी महत्त्वपूर्ण भारतीय भाषाओं के लिए अकादमी, इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसलेशन एंड इंटरप्रिटेशन, भाषा  संस्थान, शास्त्रीय भाषाओं के लिए विश्वविद्यालयों में विभाग तथा पालि, प्राकृत व फारसी के लिए राष्ट्रीय संस्थान की स्थापना, संस्कृत के अध्ययन का विस्तार, लुप्त प्राय भाषाओं के संरक्षण के लिए नीति, छात्रवृत्ति व पुरस्कारों की स्थापना, रोजगार के मानदंडों में भारतीय भाषाओं में प्रवीणता को अर्हता के रूप में शामिल करना कुछ ऐसे कदम हैं जो भारत में आने वाले दिनों में भारतीय भाषाओं की दशा, दिशा और भविष्य सब कुछ बदल कर रख देंगे। बशर्ते कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के इन प्रावधानों को उसी भावना से लागू किया जाए जिस भावना से नीति निर्माताओं ने इन्हें शामिल किया है। 

संदर्भ सूची: 

1. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 

2. सानू संक्रात (2015).  अंग्रेजी माध्यम का भ्रमजाल. प्रभात प्रकाशन नई दिल्ली. 

3. वर्मा, विमलेश कांति (2009). भाषा, साहित्य और संस्कृति . ओरिएंट ब्लैक स्वान प्रकाशन 

4. दिनकर, रामधारी सिंह (1956). संस्कृति के चार अध्याय . साहित्य अकादमी नई दिल्ली   


1 टिप्पणी:

  1. वाह क्या गजब लिखा है..
    अच्छे शब्द, गंभीर अध्ययन और चिंतन से परिपूर्ण लेख
    बधाई..
    स्नेह, शुभकामनाएँ
    राजीव रावत

    जवाब देंहटाएं