हिंदी निबंध व भाषण || Hindi Essay & Speech


होली का त्योहार

युवकजनों की है जान ;
   ख़ून की होली जो खेली ।
पाया है लोगों में मान,
   ख़ून की होली जो खेली ।

रँग गये जैसे पलाश;
   कुसुम किंशुक के, सुहाए,
कोकनद के पाए प्राण,
    ख़ून की होली जो खेली ।

निकले क्या कोंपल लाल,
     फाग की आग लगी है,
फागुन की टेढ़ी तान,
     ख़ून की होली जो खेली ।

खुल गई गीतों की रात,
      किरन उतरी है प्रात की ;-
हाथ कुसुम-वरदान,
   ख़ून की होली जो खेली ।

आई सुवेश बहार,
   आम-लीची की मंजरी;
कटहल की अरघान,
    ख़ून की होली जो खेली ।

विकच हुए कचनार,
    हार पड़े अमलतास के ;
पाटल-होठों मुसकान,
    ख़ून की होली जो खेली ।
       महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निरालाकी उक्त पंक्तियों को फाल्गुन माह में पढ़ना कुछ विशेष सोचने को मजबूर करती है। माह फरवरी, 2019 में हमारे वीर सैनिकों की शहादत खून की होली ही थी। कवि प्रदीप ने भी इसे अपने गीत ऐ मेरे वतन के लोगोंमें लिखा है – जब देश में थी दीवाली, तब वे खेल रहे थे होली। हम जो सुकून और उल्लास भरा जीवन जी रहे हैं और भांति-भांति के त्योहार, मेले, उत्सवों का आनंद ले रहे हैं, वह हमारे वीर सैनिकों के त्याग और बलिदान से संभव हो पा रहा है। आज हम अपने घर में सुरक्षित रूप से होली का त्योहार मना रहे हैं, तो वह संभव हो पा रहा है सरहद पर तैनात उस सैनिक की बदौलत जो उत्सव में परिवार से दूर अपनी ड्युटी कर रहा है।
       इन्हीं बातों को सोचते हुए बचपन की होली याद आ रही है। यह उस समय की बात है जब देश सेवा, त्याग और बलिदान जैसे शब्द केवल पुस्तकों में पढ़ा करते थे, उनके सही मायने नही पता थे। किसी समय हमारे गांव पूर्ण आत्मनिर्भर हुआ करते थे। वह दौर उन्ही परंपराओं का पालन कर रहा था। त्योहारों के समय सब कुछ होममेड होता था, चाहे वह मिठाइयां हों, पकवान हों या रंग, पिचकारी, अबीर, गुलाल हों। उस समय ड्रैगन (चीन) की डरावनी और खतरनाक व्यापारिक नीतियां हम पर हावी नही थीं। बांस के पतले टुकड़े को काटकर उसे वैक्युम मशीन की भांति बना लेते थे, इस प्रकार की आधुनिक प्लास्टिक की चीन निर्मित पिचकारी बहुतायत में मिल जाती है। रंग के लिए टेशु (पलाश) के फूल उबाल लिये और रंग हो गया तैयार। इतना सब करने के बाद शुरू हो गए लोगों को भिगोने के लिए।
     गांव की महिलाएं या आलसी पुरुष जो ऐसा नही कर पाते थे, वे गोबर या कीचड़ से होली खेलकर अपने मन की भड़ास निकाल लिया करते थे। गांव के कुछ बुजुर्ग अपने नेतृत्व में टोलियां इकट्‍ठा करके फाग इत्यादि गाकर होली के रंग में सराबोर हो जाया करते थे। कुछ उत्साही नवयुवक भांग, ठंढई आदि छानकर उसके रंग में डूब जाया करते थे। नयी-नवेली भाभियों की शामत आयी रहती थी। नानुकुर और मनुहार करते-करते देवर टाइप के लोग उनको रंग लगाने के बहाने खोज ही लेते थे।
     होली के पहले वाली रात गांव के बच्चों (बच्चा कहना ठीक नही है) या किशोर कहें उनके लिए बड़ी मौज की होती थी, रात में गांव में धमाचौकड़ी मचाने के बाद होली जलाने के पवित्र स्थल पर इकट्‍ठा होते थे और गांव के पंडित जी मुहुर्त के समय होली में आग लगाते थे। होली जो कि सूखी लकड़ियों, उपलों आदि के ढेर और उनके बीच में भक्त प्रहलाद की मान्यतास्वरूप अरंडी का पेड़ के रूप में होती थी। कुछ बुजुर्ग लोगों में मान्यता थी कि वे उबटन आदि अपने शरीर में लगाकर उसका मैल इकट्‍ठा करके जलती होली में डालते थे, उसके पीछे उनकी मान्यता थी कि वे अपने तन-मन की गंदगी को निकाल कर खतम कर रहे हैं और नए वर्ष में (विक्रम संवत के अनुसार होली का दिन नव वर्ष का पहला दिन होता है) साफ-सुथरे तन-मन के साथ प्रवेश कर रहे हैं।
     होली का त्योहार करीब-करीब पूरे देश में बड़े जोश-उत्साह के साथ मनाया जाता है। सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र ब्रज की होली होती है। बरसाने की लठमार होली के तो क्या कहने। कई फिल्मों में इस दृश्य को फिल्माया गया है। मथुरा और वृंदावन में तो 15 दिन तक यह पर्व मनाया जाता है। हरियाणा में होली को धुलंडी के नाम से मनाया जाता है। इसमें भाभी द्वारा देवर को विनोद के रूप में तंग करने की प्रथा है। बंगाल में दोल जात्रा के रूप में यह उत्सव मनाया जाता है, जो कि चैतन्य महाप्रभु का जन्म दिन है । पंजाब में होला मोहल्ला के रूप में यह त्योहार मनाते हैं। महाराष्ट्र में रंगपंचमी के रूप में इसे मनाते हैं। तमिलनाडू में कमन पोडिगई के रूप में तो मणिपुर में याओसांग के रूप में इसे मनाया जाता है।
      बालीवुड फिल्मों में होली का बड़ा महत्व रहा है। तमाम गाने, संवाद आदि होली से भरे पड़े हैं। शोले फिल्म में गब्बर का डायलाग – कब है होली? बड़ा प्रसिद्ध हुआ। डॉन फिल्म में अमिताभ बच्चन का गाया हुआ गाना- होली खेलें रघुवीरा अवध मेंसबकी जवान पर रहता है। फिल्म टायलेट एक प्रेमकथामें लट्ठमार होली पर फिल्माया हुआ गाना गोरी तू लट्ठ मारबड़ा ही रोचक लगता है। फिल्म ये जवानी है दीवानीमें भी एक गाना बलम पिचकारीसुनते-सुनते मन में पिचकारी चलने लगती है।
      होली का उत्सव हमारे संपूर्ण जीवन और संस्कृति में समाया हुआ है। भारतीय संस्कृति अपने इन्हीं उत्सवों की वजह से अपनी महान परंपराओं का अबाध गति से निर्वहन करती आ रही है। इस समय संपूर्ण प्रकृति भी हास और उल्लास के रंग में रंगी नजर आती है। आइए इस होली में पूरी मस्ती और उल्लास के साथ सराबोर हो जाते हैं।


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